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मनोज कुमार भट्ट स्टेट रिपोर्टर बस्तर छत्तीसगढ़
620 साल पुरानी परंपरा: साल-सागौन की लकड़ियों से बनेगा दो मंजिला विजय रथ
जगदलपुर। बस्तर दशहरा की पहचान केवल 75 दिनों की लंबी अवधि से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं से भी है। इसमें दो मंजिला रथ का संचालन सबसे बड़ा आकर्षण है। करीब 620 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत इस वर्ष भी नवरात्र में विशाल विजय रथ की परिक्रमा होगी।
रथ का निर्माण सिरहासार भवन के सामने बस्तर के पारंपरिक कारीगरों द्वारा किया जाएगा। इसके लिए दरभा के जंगलों से साल और सागौन की लकड़ी लाई जा रही है। करीब 6 ट्रकों में 55 घन मीटर लकड़ी पहुंचाई जा रही है। इन्हीं लट्ठों को तराशकर दो मंजिला रथ बनाया जाएगा।
रथ बनाने की जिम्मेदारी झाड़उमरगांव और बेड़ाउमरगांव के पुश्तैनी कारीगरों की है। ये कारीगर पीढ़ियों से आधुनिक मशीनों के बजाय पारंपरिक औजारों से रथ तैयार करते हैं। इसकी खास बात है कि इसमें लोहे की कीलों का इस्तेमाल नहीं होता। लकड़ी के हिस्सों को पारंपरिक तकनीक से जोड़कर मजबूती दी जाती है।
मान्यता है कि जगन्नाथपुरी के राजा ने बस्तर राजा को ‘रथपति’ की उपाधि दी थी और 16 चक्कों वाले रथ की अनुमति दी थी। बाद में इसे तीन हिस्सों में बांटा गया। चार चक्कों वाला रथ गोंचा पर्व में, जबकि नवरात्र में आठ चक्कों वाला विजय रथ और चार चक्कों वाला फूल रथ निकलता है। विजय रथ पर मां दंतेश्वरी और मां मावली के छत्र विराजते हैं।
बस्तर दशहरा में रावण दहन नहीं होता। यह पर्व स्थानीय देवी परंपरा, आदिवासी संस्कृति और मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा है। हर साल इसे देखने देश-विदेश से एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं।
रथ निर्माण की शुरुआत के साथ ही बस्तर में दशहरा का माहौल बनने लगता है। यह केवल निर्माण नहीं, बल्कि कारीगरों के हाथों से जीवंत होती सांस्कृतिक विरासत है।
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