CG में आदिवासी अधिकारों की लड़ाई तेज: चक्का जाम के बाद प्रशासन को 20 दिन का अल्टीमेटम, मांगें नहीं मानी तो ‘जेल भरो आंदोलन’
जयकिशन साहू... हमर प्रदेश छत्तीसगढ़ न्यूज
कोहाबाहरा के ग्रामीणों ने 1987 के ऐतिहासिक समझौते, वनाधिकार और जमीन के सीमांकन को लेकर उठाई आवाज
धमतरी। जिले के नगरी क्षेत्र में आदिवासी ग्रामीणों के वनाधिकार और जमीन से जुड़े पुराने विवाद को लेकर आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। ग्राम कोहाबाहरा के ग्रामीणों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर 8 अक्टूबर 2026 को चक्का जाम कर जोरदार प्रदर्शन किया।

ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से वन भूमि, पारंपरिक वन अधिकार और पुराने अभिलेखों से जुड़े मामलों का निराकरण नहीं हो पाया है। ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने 5 अगस्त 1987 के ऐतिहासिक सिहावा-नगरी समझौते का हवाला देते हुए उसके पालन की मांग की है।
प्रशासन को 20 दिन का अल्टीमेटम...
प्रदर्शन के बाद ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपते हुए प्रशासन को 28 अक्टूबर 2026 तक 20 दिनों का समय दिया है। ग्रामीणों ने साफ कहा है कि अगर तय समय सीमा के भीतर उनकी मांगों का स्थायी और निष्पक्ष निराकरण नहीं हुआ, तो प्रभावित आदिवासी परिवार सामूहिक रूप से ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू करेंगे।
ग्रामीणों ने कहा कि आंदोलन में महिला, बच्चे, बुजुर्ग और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे।
1987 के समझौते का दिया हवाला...
ज्ञापन में ग्रामीणों ने 5 अगस्त 1987 को तत्कालीन वन विभाग के अधिकारियों, कलेक्टर और जनप्रतिनिधियों के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते का उल्लेख किया है। ग्रामीणों का दावा है कि इस समझौते में वन ग्रामों में काबिज आदिवासियों के व्यवस्थापन और उनके अधिकारों के संरक्षण से संबंधित प्रावधान किए गए थे।
ग्रामीणों का आरोप है कि दशकों बीत जाने के बाद भी इन अधिकारों से जुड़े कई मामले लंबित हैं।
वन और राजस्व विभाग से संयुक्त सीमांकन की मांग....
ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम द्वारा विवादित भूमि का सीमांकन कराए जाने की मांग शामिल है। उनका कहना है कि सीमांकन की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की जाए, ताकि वर्षों पुराने विवाद का स्थायी समाधान निकल सके।
इसके साथ ही ग्रामीणों ने DFO धमतरी के अपीलीय आदेश के पालन में संबंधित जांच प्रतिवेदन और अभिलेख ग्राम सभा के सामने सार्वजनिक किए जाने की भी मांग की है।
PESA और FRA का भी हवाला...
ज्ञापन में ग्रामीणों ने संविधान की पांचवीं अनुसूची, PESA Act 1996 और वन अधिकार अधिनियम 2006 (FRA) का हवाला देते हुए ग्राम सभा के अधिकारों को मान्यता देने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि आदिवासी समाज के पारंपरिक वन अधिकार, निस्तार और कास्त से जुड़े अधिकारों को सुरक्षित किया जाना चाहिए।
मांगें नहीं मानी तो आंदोलन होगा तेज...
ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा है कि 28 अक्टूबर तक यदि समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। ज्ञापन में परिवार सहित जिला एवं तहसील मुख्यालय की ओर कूच कर जेल भरो आंदोलन करने की बात कही गई है।
ग्रामीणों ने इस पूरे मामले में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, संभागीय आयुक्त और छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग सहित कई उच्च अधिकारियों को भी ज्ञापन की प्रतिलिपि भेजी है।
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