✍️ हमर प्रदेश छत्तीसगढ़
स्टेट हेड रिपोर्टर किशोर कुमार
रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं और मातृत्व की आस्था से जुड़ा प्रमुख पर्व कमरछठ (हलषष्ठी) इस वर्ष 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाया जाएगा। यह पर्व संतान की सुख-समृद्धि, स्वस्थ जीवन और दीर्घायु की कामना के लिए माताओं द्वारा श्रद्धा और विधि-विधान से मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में इसे कमरछठ या खमरछठ के नाम से विशेष पहचान मिली हुई है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे हलछठ, हरछठ और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है।
पंचांग के अनुसार इस बार कमरछठ के दिन भरणी नक्षत्र और ध्रुव योग का संयोग रहेगा। यह पर्व जन्माष्टमी से दो दिन पहले भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।
भगवान बलराम से जुड़ी है कमरछठ की मान्यता
हलषष्ठी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम से माना जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र हल था और इसी कारण इस पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा। उन्हें हलधर और हलायुध सहित कई नामों से जाना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से संतान की रक्षा, स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। संतान की कामना रखने वाली महिलाएं भी श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करती हैं।
बिना हल चले खाद्य पदार्थों का होता है सेवन
छत्तीसगढ़ में कमरछठ की सबसे खास पहचान इसकी पारंपरिक पूजा और भोजन पद्धति है। इस दिन ऐसी वस्तुओं का सेवन करने की परंपरा है, जिन्हें खेत में हल चलाकर पैदा नहीं किया गया हो।
पूजा के बाद व्रती महिलाएं पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों का सेवन करती हैं। पारंपरिक रूप से इन भाजियों को पानी और काली मिर्च के साथ पकाया जाता है। कई स्थानों पर इस दिन भैंस के दूध, दही और घी का सेवन करने की परंपरा भी है।
अंग्रेजी मिर्च का भी विशेष महत्व
कमरछठ की पारंपरिक भोजन सामग्री में स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अंग्रेजी मिर्च का भी उल्लेख मिलता है। इसे अन्य सामग्री के साथ पारंपरिक भोजन में शामिल किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके उपयोग और मान्यता में स्थानीय परंपराओं के अनुसार अंतर देखने को मिलता है।
सगरी बनाकर की जाती है पूजा
कमरछठ के अवसर पर महिलाएं घरों और मोहल्लों में सगरी यानी छोटे तालाब के स्वरूप की आकृति बनाती हैं। इसके बाद सगरी में दूध और दही अर्पित कर पूजा की जाती है।
कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्र होकर षष्ठी माता की पूजा करती हैं और अपने बच्चों के स्वस्थ, सुखी एवं दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं।
कमरछठ में 6 अंक का विशेष महत्व
कमरछठ की परंपरा में 6 अंक का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के दौरान सगरी में छह-छह बार पानी डालने की परंपरा है। इसके अलावा छह खिलौने, छह लाई के दोने और छह चुकिया यानी मिट्टी के छोटे घड़े चढ़ाने की परंपरा भी कई स्थानों पर निभाई जाती है।
इसी तरह छह प्रकार के छोटे कपड़ों को सगरी के जल में डुबोकर संतान की कमर पर उन्हीं कपड़ों से छह बार थपकी दी जाती है। स्थानीय परंपरा में इसे ‘पोती मारना’ कहा जाता है।
बच्चों की पीठ पर लगाई जाती है पीली पोती
छत्तीसगढ़ की कमरछठ परंपरा में बच्चों से जुड़ी एक विशेष रस्म भी निभाई जाती है। पूजा के बाद कई स्थानों पर माताएं अपने बच्चों की पीठ पर पीली पोती लगाती हैं। मान्यता है कि इससे संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना की जाती है।
कमरछठ केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, मातृत्व की आस्था और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक भी है। इस दिन महिलाएं पूरे श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना कर अपनी संतान और परिवार के मंगल की कामना करती हैं।
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