कोरोना काल की आड़ में हुआ महाघोटाला! छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में चहेतों को मलाईदार पोस्टिंग का पर्दाफाश, बैकडोर इंट्री और फर्जीवाड़े पर उठे तीखे सवाल
रायपुर / बिलासपुर:
आपदा को अवसर बनाने का मुहावरा वैसे तो व्यापार और राजनीति में खूब सुना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में बैठे अफसरों और रसूखदार शिक्षकों ने इसे जिस बेशर्मी के साथ अमलीजामा पहनाया, उसकी परतें अब एक-एक कर उधड़ने लगी हैं। जब पूरा देश और प्रदेश कोरोना महामारी की विभीषिका में जीवन-मौत से जूझ रहा था, स्कूल बंद थे और आम जनता घरों में कैद थी—उसी दौर में शिक्षा विभाग के भीतर ट्रांसफर, अटैचमेंट, युक्तियुक्तकरण और बैकडोर पोस्टिंग का ऐसा 'काला खेल' खेला गया, जिसकी गूंज अब प्रशासनिक गलियारों में भूचाल ला रही है।
महामारी का सन्नाटा और दफ्तरों में 'फिक्सिंग' की झड़ी
कोरोना काल (2020-2021) के दौरान जब सामान्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं, स्थानांतरण और स्कूल संचालन पूरी तरह ठप थे, तब जिला शिक्षा कार्यालयों (DEO) और विभागीय दफ्तरों में फाइलों का खेल तेजी से दौड़ाया जा रहा था। जांच और विभागीय चर्चाओं से जो कड़वी सच्चाई सामने आ रही है, उसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है:

सैलरी घर बैठे, पोस्टिंग मनचाही: दूरदराज, ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में पदस्थ सैकड़ों चहेते शिक्षकों को कोरोना ड्यूटी या विशेष कार्य के नाम पर जिला मुख्यालय और सुगम शहरी इलाकों के स्कूलों में बैकडोर से 'अटैच' कर दिया गया।
फर्जी आदेश और बैकडेटिंग का खेल: बिना किसी शासन स्तर की अनुमति के, स्थानीय अधिकारियों और बाबुओं के गठजोड़ ने बैकडेट में आदेश जारी कर मनपसंद स्कूलों की कुर्सियां बांट दीं।
युक्तियुक्तकरण और प्रमोशन की हेराफेरी: नियमों को ताक पर रखकर ऐसे शिक्षकों को उपकृत किया गया जो वर्षों से मूल पदस्थापना से नदारद थे, जबकि नियमबद्ध और ईमानदारी से ड्यूटी करने वाले शिक्षकों के अधिकारों पर खुलेआम डाका डाला गया।
जब खुली फाइलें तो उड़े होश: 6 साल बाद भी कुर्सी पर अंगद की तरह जमे
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि महामारी के दौरान किए गए इन 'कागजी प्रबंधों' को महामारी खत्म होने के वर्षों बाद तक बनाए रखा गया। कई शिक्षक तो ऐसे निकले जिनका ट्रांसफर साल 2019 या 2020 में कहीं और हो चुका था, लेकिन कोरोना और अदालती याचिकाओं का बहाना बनाकर वे लगातार अपनी पुरानी मलाईदार सीटों पर जमे रहे।
हाल ही में जब लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने अटैचमेंट खत्म करने और गैर-हाजिर रहने वालों पर 'ब्रेक इन सर्विस' तथा सख्त दंडात्मक कार्रवाई के तेवर दिखाए, तब जाकर इस सिंडिकेट में हड़कंप मचा है।
सवाल सीधे सिस्टम से: उस दौर के DEO और बाबुओं पर कब कसेगा शिकंजा?

इस महाघोटाले से बेनकाब हुए तंत्र पर अब कई ज्वलंत सवाल उठ रहे हैं:
जिम्मेदारी किसकी? आपदा के उस नाजुक दौर में किसकी कलम से बिना पात्रता और बिना शासन की मंजूरी के चहेतों को उपकृत करने वाले आदेश निकले?
कुंभकरणी नींद या मिलीभगत? सालों तक इन अवैध पोस्टिंग और अटैचमेंट पर सालाना ऑडिट या प्रशासनिक इंस्पेक्शन क्यों नहीं हुआ? क्या उच्च अधिकारियों की आंखों पर नोटों या राजनीतिक सिफारिशों की पट्टी बंधी थी?

सिर्फ आदेश या सीधी जेल? क्या शिक्षा विभाग सिर्फ दिखावे के लिए नोटिस और शो-कॉज जारी कर मामले को रफा-दफा करेगा, या फिर कोरोना काल में हुए इस प्रशासनिक अपराध के जिम्मेदार अफसरों और शिक्षकों पर एफआईआर दर्ज कर रिकवरी कराई जाएगी?
आर-पार के मूड में ईमानदार शिक्षक और बेरोजगार युवा
शिक्षा विभाग के इस काले खेल के उजागर होने से उन लाखों डी.एड/बी.एड प्रशिक्षित युवाओं और सुदूर गांवों में सेवाएं दे रहे ईमानदार गुरुजनों में गहरा आक्रोश है। साफ है कि अगर शासन और शिक्षा मंत्रालय ने इस 'कोरोना कालीन महाघोटाले' की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई और दोषियों की बर्खास्तगी का सख्त संदेश नहीं दिया, तो यह मुद्दा केवल विभागीय दफ्तरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़कों पर बड़े जनांदोलन की शक्ल अख्तियार करेगा।
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़

हमर प्रदेश सी जी
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