Wednesday, October 28 2026
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खून के रिश्ते हाशिए पर, दौलत की चौखट पर सजदा: आधुनिकता की अंधी दौड़ में बिखरता परिवार और सिसकती संवेदनाएं

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खून के रिश्ते हाशिए पर, दौलत की चौखट पर सजदा: आधुनिकता की अंधी दौड़ में बिखरता परिवार और सिसकती संवेदनाएं

विशेष सामाजिक आलेख / विचार विमर्श


खून के रिश्ते हाशिए पर, दौलत की चौखट पर सजदा: आधुनिकता की अंधी दौड़ में बिखरता परिवार और सिसकती संवेदनाएं


बिलासपुर:
भौतिकता और चकाचौंध के इस आधुनिक दौर में इंसानियत जिस तेजी से आर्थिक तराजू पर तोली जा रही है, उसने भारतीय सामाजिक ताने-बाने की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। कभी त्याग, समर्पण और अटूट प्रेम के प्रतीक माने जाने वाले पारिवारिक रिश्ते आज मतलब, नफे-नुकसान और दिखावे की भेंट चढ़ रहे हैं। बिलासपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं शपथ आयुक्त निशी कान्त शुक्ला ने समकालीन समाज के इसी कड़वे यथार्थ को उजागर करते हुए एक गंभीर चिंतन साझा किया है— "वर्तमान समय में खून का रिश्ता कमजोर पड़ रहा है और इंसान दौलत के आगे नतमस्तक हो रहा है।"
पैसों की भूख और बदलती सामाजिक प्राथमिकताएं
आज समाज में सम्मान का पैमाना इंसान के संस्कार नहीं, बल्कि उसकी अनाप-शनाप कमाई बन चुका है। पैसे कमाने की इस अंतहीन होड़ ने लोगों को नैतिक पतन की ओर धकेल दिया है। सरकारी नौकरियों के प्रति बढ़ता आकर्षण अक्सर भ्रष्टाचार के मौकों से जुड़कर देखा जाने लगा है। नतीजतन, अमीर और गरीब के बीच की खाई केवल आर्थिक नहीं रही, बल्कि इसने सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों में भी गहरी दरार पैदा कर दी है। सगे भाई से महीनों बातचीत बंद रहती है, लेकिन दौलत और रुतबे वाले अजनबियों को झुक-झुक कर सलाम किया जा रहा है।
जमीन-जायदाद से प्यार, बुजुर्ग माता-पिता से तकरार
आधुनिक परिवारों की सबसे विदारक तस्वीर बुजुर्गों की स्थिति है:
 * विरासत चाहिए, मां-बाप नहीं: बेटों को माता-पिता की बनाई जमीन-जायदाद और संपत्ति पर पूरा हक चाहिए, लेकिन उन बूढ़े कंधों को बुढ़ापे का सहारा देने के लिए कोई तैयार नहीं दिखता।
 * मन्नत से जन्मे बेटे दिखा रहे वृद्धाश्रम की राह: जिन औलादों की खातिर मां-बाप ने मन्नतें मांगीं, पेट काटकर पूरी उम्र की कमाई न्योछावर कर दी, आज वही औलादें अपने माता-पिता को घर के एक कोने में रखने से भी कतरा रही हैं। वृद्धाश्रमों में बढ़ती बुजुर्गों की तादाद इसी गिरती संवेदनशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
 * शादी के बाद बिखरते रिश्ते: शादी से पहले जो बेटा मां-बाप का अरमान होता है, कई बार शादी के बाद वही रिश्ता सिरदर्द में तब्दील हो जाता है। मां-बाप को अपनी ही छत के नीचे अपनी आजादी छिनती महसूस होती है और अपनों के बीच ही उन्हें दो शब्द बोलने का अधिकार नहीं रह जाता।
ससुराल से नजदीकी, सगे भाई-बहनों से बेरुखी
पारिवारिक ढांचे में आए असंतुलन पर चोट करते हुए अधिवक्ता शुक्ला ने रेखांकित किया कि आज का युवा वर्ग सास-ससुर और ससुराल पक्ष की हर सलाह को सिर-माथे रखता है, जबकि अपने जन्मदाता माता-पिता की सच्ची सलाह भी उन्हें नागवार गुजरती है। साले-साली के साथ नजदीकियों के दौर में सगे भाई-बहनों से दूरी बना ली जाती है, जिससे संयुक्त परिवार की संकल्पना पूरी तरह बिखर चुकी है।
समय का चक्र और कर्मों का हिसाब: अधिवक्ता निशी कान्त शुक्ला की दो टूक चेतावनी
अधिवक्ता निशी कान्त शुक्ला ने समाज को आगाह करते हुए कहा:
> "जो लोग आज अपने बूढ़े मां-बाप और सगे भाई-बहनों को बोझ समझकर दरकिनार कर रहे हैं, उन्हें समय के चक्र को नहीं भूलना चाहिए। समय सबको उसकी ही भाषा में भरपूर जवाब देता है। आज आप जो बीज बो रहे हैं, कल आपकी अपनी औलाद आपको वही फसल काटकर लौटाएगी।"
> 
उन्होंने कहा कि पैसे से दुनिया की हर भौतिक सुख-सुविधा और दौलत खरीदी जा सकती है, लेकिन सच्चे रिश्ते केवल दिल से जुड़ते हैं, तिजोरी की चाबी से नहीं। वक्त रहते अगर इन मानवीय मूल्यों और रिश्तों की कद्र नहीं की गई, तो वह दिन दूर नहीं जब इंसान के पास दौलत तो बेहिसाब होगी, मगर साथ बांटने वाला एक भी अपना नहीं बचेगा।


अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़ 

हमर प्रदेश सी जी

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in Entertainment.

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