Thursday, October 29 2026
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छत्तीसगढ़ में चावल के दाम आसमान पर, जीरा राइस ₹120 तो अब्बा हुजूर ₹110 प्रति किलो तक पहुंचा

State Head - KISHOR_HP
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Hamar Pradesh Cg.com
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✍️ हमर प्रदेश छत्तीसगढ़ न्यूज स्टेट हेड रिपोर्टर किशोर कुमार 

 

बाहरी राज्यों से आने वाले चावल की कीमतों में भारी उछाल से बिगड़ा रसोई का बजट, स्थानीय स्तर पर बारीक धान की खेती को बढ़ावा देने की उठी मांग

भिलाई। धान के कटोरे के नाम से देशभर में पहचान रखने वाले छत्तीसगढ़ में चावल की बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश में धान का भरपूर उत्पादन होने के बावजूद दूसरे राज्यों से आने वाले विभिन्न लोकप्रिय और सुगंधित चावल की किस्में महंगी हो रही हैं। भिलाई-दुर्ग के बाजारों में चावल की कीमतों में आई तेजी से मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों का घरेलू बजट प्रभावित हो रहा है।

बाजार में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जीरा राइस की कीमत 90 रुपये से बढ़कर 120 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। वहीं, काली मूंछ चावल 65 रुपये से बढ़कर 85 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। इसी तरह जय श्रीराम ब्रांड के चावल की कीमत 62 रुपये से बढ़कर 100 रुपये प्रति किलो और अब्बा हुजूर चावल की कीमत 70 रुपये से बढ़कर 110 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात सामने आई है।

चावल की इन किस्मों की कीमतों में बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं को पहले की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ रहा है। हालांकि, अलग-अलग दुकानों, ब्रांड और गुणवत्ता के आधार पर वास्तविक खुदरा कीमतों में अंतर हो सकता है।

फसल क्षति और आपूर्ति में कमी की चर्चा

व्यापारियों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में मोटे और मध्यम धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद के अनुरूप कई बारीक और सुगंधित चावल की किस्मों के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता बनी हुई है।

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों से आने वाले चावल की आपूर्ति प्रभावित होने पर बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। हालिया मौसम संबंधी परिस्थितियों और संभावित फसल क्षति को भी कीमतों में तेजी के कारणों में गिना जा रहा है। हालांकि, इन राज्यों में फसल को हुए नुकसान और आपूर्ति में आई गिरावट की आधिकारिक पुष्टि के बिना इसे कीमतों में बढ़ोतरी का निश्चित कारण नहीं माना जा सकता।

हर महीने बढ़ सकता है घरेलू बजट

चावल अधिकांश भारतीय परिवारों के भोजन का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में इसकी कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर रसोई के खर्च पर पड़ता है।

उदाहरण के तौर पर, यदि किसी परिवार द्वारा खरीदे जाने वाले चावल की कीमत में 30 रुपये प्रति किलो की वृद्धि होती है और परिवार हर महीने 25 किलो चावल खरीदता है, तो उसे प्रतिमाह 750 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे। सालभर में यह अतिरिक्त खर्च 9,000 रुपये तक पहुंच सकता है।

महंगाई के बीच पहले से ही घरेलू खर्चों का प्रबंधन कर रहे परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ चिंता का विषय है।

धान का कटोरा होने के बावजूद दूसरे राज्यों पर निर्भरता क्यों?

छत्तीसगढ़ में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन यहां उत्पादित सभी किस्में उपभोक्ताओं की अलग-अलग पसंद और बाजार की मांग को पूरा नहीं करतीं। चावल की सुगंध, दाने का आकार, स्वाद और पकने की विशेषताओं के कारण कई उपभोक्ता दूसरे राज्यों में उत्पादित विशिष्ट किस्मों को प्राथमिकता देते हैं।

यही वजह है कि स्थानीय उत्पादन अधिक होने के बावजूद बाहरी राज्यों से आने वाले चावल का बाजार बना हुआ है। इस स्थिति में स्थानीय स्तर पर बारीक और सुगंधित धान का उत्पादन बढ़ाना एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है।

स्थानीय किसानों को प्रोत्साहन देने की जरूरत

बाजार के जानकारों और उपभोक्ताओं का मानना है कि राज्य सरकार को छत्तीसगढ़ में बारीक एवं सुगंधित धान की खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए।

इसके लिए किसानों को उन्नत बीज, आधुनिक कृषि तकनीक, उचित प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जा सकता है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर धान की प्रसंस्करण इकाइयों और चावल की मिलों को बढ़ावा देने से भी आपूर्ति व्यवस्था मजबूत हो सकती है।

यदि प्रदेश में उपभोक्ताओं की पसंद के अनुरूप बारीक चावल का उत्पादन बढ़ता है, तो बाहरी राज्यों पर निर्भरता कम करने और परिवहन लागत घटाने में मदद मिल सकती है। इससे भविष्य में उपभोक्ताओं को उचित कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण चावल उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ेंगी।

कीमतों पर निगरानी की मांग

चावल की बढ़ती कीमतों के बीच बाजार में विभिन्न किस्मों के भाव, आपूर्ति की स्थिति और मूल्य वृद्धि के वास्तविक कारणों की निगरानी आवश्यक है। संबंधित विभागों को थोक एवं खुदरा बाजारों से जानकारी लेकर स्थिति का आकलन करना चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं को सही कीमतों पर खाद्यान्न उपलब्ध हो सके।

अब सवाल यह है कि जब छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, तो यहां के उपभोक्ताओं को अपनी पसंद का चावल खरीदने के लिए इतनी अधिक कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है? स्थानीय उत्पादन को बाजार की मांग के अनुरूप बढ़ाने और कीमतों में स्थिरता लाने के लिए ठोस कदम उठाना समय की जरूरत है।

 

चावल के बताए गए भावों की संबंधित थोक एवं खुदरा व्यापारियों से पुष्टि की गई है भिलाई के व्यापारियो से।

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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