नाबालिग उम्र की गलती ताउम्र का अभिशाप नहीं: सहायक प्राध्यापक की बर्खास्तगी हाईकोर्ट ने की रद्द, नौकरी बहाल करने का आदेश
* 17 साल की उम्र में दर्ज मामले को छिपाने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था
* हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी— "किशोरावस्था के मुकदमों की आड़ में छीना नहीं जा सकता आजीविका का हक"
* सरकारी सेवा में नियुक्ति से जुड़े मामलों के लिए अदालत ने पेश की बड़ी कानूनी नजीर
कानूनी संवाददाता | विशेष रिपोर्ट
नाबालिग उम्र में हुई नादानी का खामियाजा क्या किसी को अपनी पूरी जिंदगी और नौकरी गंवाकर भुगतना चाहिए? इस गंभीर मानवीय और कानूनी सवाल पर हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सहायक प्राध्यापक (Assistant Professor) की बर्खास्तगी के आदेश को सिरे से रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले से वर्षों से न्याय की आस लगाए बैठे प्राध्यापक को न सिर्फ अपनी सेवा वापस मिली है, बल्कि उनके स्वाभिमान की भी बहाली हुई है।
पूरा मामला क्या था?
संबंधित सहायक प्राध्यापक को सेवा सत्यापन (Verification) के दौरान इस आधार पर पद से बर्खास्त कर दिया गया था कि उन्होंने नियुक्ति के समय अपने खिलाफ दर्ज पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छुपाई थी।
विभाग की इस सख्त कार्रवाई के खिलाफ प्राध्यापक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि:
* जिस मामले को 'आपराधिक इतिहास' बताकर कार्रवाई की गई, वह तब का था जब संबंधित व्यक्ति की उम्र महज 17 वर्ष (नाबालिग) थी।
* किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) की मूल भावना यह है कि नाबालिग उम्र में हुए किसी अपराध या दर्ज मामले का कलंक भविष्य की आजीविका, रोजगार और सामाजिक जीवन पर असर नहीं डालना चाहिए।
हाईकोर्ट का रुख: कानून का उद्देश्य सुधार है, जीवन बर्बाद करना नहीं
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद विभाग द्वारा की गई बर्खास्तगी को पूरी तरह असंगत और अन्यायपूर्ण माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि:
* किशोरवय के मामलों का संरक्षण: कानून नाबालिगों को सुधरने का अवसर देता है। 17 साल की उम्र में घटित किसी घटना को जानबूझकर छिपाया गया गंभीर अपराध नहीं माना जा सकता।
* अनुपातिकता का नियम: बिना पृष्ठभूमि और उम्र की परिस्थितियों को देखे किसी योग्य शिक्षक को सीधे नौकरी से बेदखल कर देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
* बर्खास्तगी आदेश शून्य: अदालत ने तत्काल प्रभाव से प्राध्यापक की बर्खास्तगी रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने और सभी संबंधित लाभ देने के निर्देश दिए।
> क्यों अहम है यह फैसला?
> यह फैसला उन तमाम युवाओं और कर्मचारियों के लिए राहत की बड़ी किरण है, जिनके किशोरावस्था के पुराने मामले या बंद हो चुके विवाद पुलिस वेरिफिकेशन के समय उनके करियर में रोड़ा बनकर खड़े हो जाते हैं। हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि नियमों की आड़ में किसी के भविष्य और करियर को अमानवीय ढंग से कुचला नहीं जा सकता।
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अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़

हमर प्रदेश सी जी
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