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पोला पर मिट्टी के खिलौनों की चमक पड़ी फीकी मोबाइल गेम्स के दौर में नंदी खरीदने बच्चों का उत्साह हुआ कम

MANOJ@HAMARPRADESHCG
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पोला पर मिट्टी के खिलौनों की चमक पड़ी फीकी  मोबाइल गेम्स के दौर में नंदी खरीदने बच्चों का उत्साह हुआ कम

हमर प्रदेश छत्तीसगढ़

स्टेट रिपोर्टर - मनोज भट्ट, जगदलपुर

 

पोला पर मिट्टी के खिलौनों की चमक पड़ी फीकी

मोबाइल गेम्स के दौर में नंदी खरीदने बच्चों का उत्साह हुआ कम

 

*जगदलपुर, 10 सितंबर 2026/* किसानों और पशुधन के सम्मान से जुड़ा पारंपरिक पर्व पोला (पोरा) आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ मनाया जा रहा है, लेकिन बदलते समय के साथ इससे जुड़ी परंपराएं सिमटती नजर आ रही हैं। कभी पोला पर बच्चों के लिए खास आकर्षण रहने वाले मिट्टी के बैल और पारंपरिक खिलौनों की जगह अब मोबाइल गेम्स ने ले ली है।

 

शहर के बाजार में मिट्टी से बने रंग-बिरंगे नंदी और अन्य पारंपरिक खिलौने बिक्री के लिए सजे हैं। करीब 100 रुपए में मिलने वाले इन खिलौनों को देखकर पुरानी पीढ़ी को उत्सव की याद आती है, लेकिन बच्चों में इन्हें खरीदने का उत्साह पहले जैसा नहीं है।

 

मिट्टी के खिलौने बेच रहे विक्रेता ने बताया कि पहले पोला पर बच्चे अभिभावकों के साथ मिट्टी के बैल खरीदने बाजार आते थे। बच्चे अपनी पसंद के बैल खरीदकर उन्हें सजाते और घर ले जाते थे। अब मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स ने बच्चों की पसंद बदल दी है। इस बार सुबह से शाम तक महज पांच मिट्टी के नंदी ही बिक पाए। कुछ लोग केवल परंपरा और रस्म निभाने के लिए ही खरीदारी कर रहे हैं।

 

पोला मुख्य रूप से कृषि और पशुधन से जुड़ा पर्व है। भाद्रपद अमावस्या पर मनाए जाने वाले इस पर्व में किसान अपने बैलों को नहलाकर सजाते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। बस्तर के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में पशुधन के प्रति सम्मान की यह परंपरा प्रकृति पूजा और स्थानीय कृषि संस्कृति से जुड़ी है। कई गांवों में देवगुड़ी में पूजा कर माटी देव और कुलदेवताओं का स्मरण कर अच्छी फसल और पशुधन की सुरक्षा की कामना की जाती है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में शाम के समय मांदल, टिमकी और बांसुरी की धुन के बीच लोकगीत और नृत्य का आयोजन होता है। घरों में ठेटरी, खुर्मी, चौसेला, चीला और सोहारी जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।

 

पहिए वाले मिट्टी के बैल और नंदी बच्चों के बचपन की पहचान हुआ करते थे। बाजार में इनकी घटती बिक्री बदलती तस्वीर को सामने ला रही है। पोला जैसे पर्व केवल धार्मिक और कृषि परंपरा ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बन सकते हैं।

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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