✍️ हमर प्रदेश छत्तीसगढ़ स्टेट हेड रिपोर्टर – किशोर कुमार
कांकेर। शिक्षक दिवस के मौके पर कांकेर जिले से शिक्षकों के समर्पण और साहस की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देती है। जिले के दूरस्थ और अंदरूनी इलाकों में पदस्थ शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए रोज अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं। नदी में न पुल है, न लाइफ जैकेट और न ही सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम। कई बार शिक्षक खुद नाव चलाकर नदी पार करते हैं और इसके बाद जंगल के रास्ते 1 से 6 किलोमीटर तक पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं।
उत्तर बस्तर कांकेर जिला नदी-नालों, पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। जिले के कई अंदरूनी इलाकों में आज भी आवागमन की सुविधाएं बेहद सीमित हैं। कई गांवों तक सड़क नहीं पहुंची है और नदी-नालों पर पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों और सरकारी कर्मचारियों को रोज कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
तेज बहाव के बीच खुद चलाते हैं नाव
ग्राम संगम के बारकोट इलाके में स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। नदी के दूसरी ओर बारकोट, हिदुर और खेड़ेगांव बसे हुए हैं। इन गांवों के स्कूलों में पदस्थ करीब पांच शिक्षक रोज नाव के सहारे नदी पार कर स्कूल पहुंचते हैं।
बारिश के दिनों में नदी का बहाव तेज हो जाता है, जिससे खतरा कई गुना बढ़ जाता है। शिक्षकों के पास न लाइफ जैकेट है और न सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम। कई बार उन्हें खुद चप्पू चलाकर नाव को नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक ले जाना पड़ता है। तेज बहाव में जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है।
नदी पार करने के बाद भी खत्म नहीं होती मुश्किल
नदी पार करना ही शिक्षकों की पूरी चुनौती नहीं है। दूसरी तरफ पहुंचने के बाद उन्हें जंगल और पगडंडियों से पैदल स्कूल तक जाना पड़ता है। किसी शिक्षक को करीब एक किलोमीटर तो किसी को छह किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है।
बारिश के मौसम में रास्ते कीचड़ और फिसलन से भर जाते हैं। इसके बावजूद शिक्षक रोज इन मुश्किल रास्तों से गुजरकर बच्चों को पढ़ाने पहुंचते हैं। बताया जाता है कि कांकेर जिले में करीब 32 शिक्षक ऐसे हैं, जो इसी तरह नाव के सहारे नदी-नालों को पार कर अपने स्कूलों तक पहुंचते हैं।
एक बार पलट चुकी है नाव, तैरकर बचाई थी जान
शिक्षक लोकनाथ कुम्भकार ने बताया कि एक बार नदी के तेज बहाव में नाव पलट गई थी। उस दौरान उन्होंने तैरकर अपनी जान बचाई। हादसे के बावजूद उन्होंने स्कूल जाना नहीं छोड़ा।
शिक्षकों का कहना है कि नदी पार करते समय डर जरूर लगता है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए स्कूल पहुंचना जरूरी है। इस क्षेत्र में कुछ शिक्षक 20 साल से भी अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर बनवाई नाव
सबसे बड़ी बात यह है कि शिक्षकों के लिए नदी पार करने की यह व्यवस्था सरकारी स्तर पर उपलब्ध नहीं कराई गई है। ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाकर नाव तैयार करवाई है। यही नाव अब ग्रामीणों के साथ-साथ शिक्षकों के आवागमन का भी प्रमुख साधन बनी हुई है।
ग्रामीणों और शिक्षकों का कहना है कि यदि नदी पर पुल का निर्माण हो जाए तो वर्षों पुरानी आवागमन की समस्या खत्म हो सकती है। इससे शिक्षकों के साथ-साथ स्कूली बच्चों और ग्रामीणों को भी बड़ी राहत मिलेगी।
कलेक्टर ने शिक्षकों के जज्बे को किया सलाम
मामले को लेकर कलेक्टर ने भी विषम परिस्थितियों में बच्चों को शिक्षा देने वाले शिक्षकों के समर्पण की सराहना की है। उन्होंने शिक्षकों के जज्बे को सलाम करते हुए आवागमन की समस्या को दूर करने के लिए आवश्यक प्रयास किए जाने की बात कही है।
मुश्किल रास्तों के बीच जारी है शिक्षा का सफर
कांकेर के इन शिक्षकों की कहानी सिर्फ एक कठिन सफर की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जिम्मेदारी की तस्वीर है जिसमें शिक्षक अपनी सुविधा से पहले बच्चों के भविष्य को महत्व दे रहे हैं।
तेज बहाव वाली नदी, जंगल की पगडंडियां, कीचड़ और फिसलन भरे रास्ते रोज इनके सामने चुनौती बनकर खड़े होते हैं। फिर भी हर सुबह ये शिक्षक नाव की पतवार थामकर स्कूल की ओर निकल पड़ते हैं।
इन शिक्षकों का यह जज्बा बताता है कि गुरु की भूमिका सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं होती, बल्कि बच्चों के भविष्य के प्रति एक बड़ी जिम्मेदारी भी होती है।
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