अभिषेक कुमार पाण्डेय ,स्टेट हेड रिपोर्टर ,बिलासपुर छत्तीसगढ़
‘मंजिल से ज्यादा जरूरी है सही रास्ता’—डॉ. ललित माखीजा
बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ में जीवन के अनुभवों पर खुलकर बोले डॉ. माखीजा, पत्रकारों के लिए ओपीडी शुल्क माफ करने की घोषणा
बिलासपुर। जिंदगी में मंजिल तय करना आसान है, लेकिन उस मंजिल तक पहुंचने के दौरान परिस्थितियों के मुताबिक रास्ता बदल पाना ही असली समझदारी है। जीवन को लेकर इसी सोच को सामने रखते हुए विश्व हिंदू परिषद छत्तीसगढ़ के प्रदेशाध्यक्ष और प्रख्यात नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. ललित माखीजा ने कहा कि ऐसी कोई मंजिल तय नहीं करनी चाहिए, जिसके लिए जरूरत पड़ने पर रास्ता बदलना ही संभव न हो। शनिवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में उन्होंने अपने जीवन के कई ऐसे किस्से साझा किए, जिनमें संघर्ष से ज्यादा परिस्थितियों को समझकर आगे बढ़ने की सीख दिखाई दी।
कार्यक्रम में डॉ. माखीजा ने अपने बचपन से लेकर डॉक्टर बनने तक के सफर, चिकित्सा सेवा, सामाजिक जीवन और संगठनात्मक जिम्मेदारियों तक की कहानी पत्रकारों के साथ साझा की। बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने कभी किसी पद या उपलब्धि को जीवन की अंतिम मंजिल नहीं माना। उनके लिए सामने आया दायित्व ही उस समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी रहा और उसे पूरी क्षमता से निभाना ही प्राथमिकता रही।
बड़े परिवार में पले, खुद बनाई अपनी राह
अपने बचपन की चर्चा करते हुए डॉ. माखीजा ने बताया कि उनका परिवार बड़ा था। पिता के पांच छोटे भाई और छह बहनें थीं और परिवार में पढ़ाई की दिशा में आगे बढ़ने वाले वे पहले लड़के थे। उड़िया रेलवे क्षेत्र मिडिल स्कूल से आठवीं तक शिक्षा लेने के बाद उन्होंने गुरुनानक स्कूल और फिर भारतमाता स्कूल में पढ़ाई की।
उन्होंने बताया कि उनके जीवन में आर्थिक संघर्ष उस अर्थ में नहीं था कि दो वक्त के भोजन या फीस की चिंता करनी पड़े, लेकिन सही दिशा दिखाने वाला कोई खास मार्गदर्शक भी नहीं था। परिवार की किराना दुकान में हाथ बंटाते हुए उन्होंने समाज के अलग-अलग लोगों को करीब से देखा और समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनते गए।
इंजीनियरिंग की राह छूटी, मेडिकल कॉलेज का दरवाजा खुला
डॉक्टर बनने की कहानी बताते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआत में उनका रुझान इंजीनियरिंग की ओर था। मित्र डॉ. श्रीकांत गिरी के साथ पॉलिटेक्निक में चयन भी हुआ, लेकिन शिक्षक देवेंद्र शेमानी ने दोनों को 12वीं के बाद इंजीनियरिंग करने की सलाह दी।
विषय चयन के दौरान बायोलॉजी लेने के बाद परिस्थितियां बदलीं और उन्होंने पीएमटी की तैयारी शुरू कर दी। खास बात यह रही कि उस समय उन्हें पीएमटी की परीक्षा और उसकी तैयारी की पूरी जानकारी तक नहीं थी। मेहनत के दम पर अच्छी रैंक हासिल हुई और रायपुर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया।
हिंदी माध्यम से आने के कारण मेडिकल की अंग्रेजी पढ़ाई शुरुआत में आसान नहीं थी, लेकिन उन्होंने चुनौती को स्वीकार किया और धीरे-धीरे खुद को उसी माहौल के अनुरूप ढाल लिया।
‘कमी वहीं दिखाई देती है, जहां तुलना शुरू होती है’
जीवन में संतोष के सवाल पर डॉ. माखीजा ने कहा कि व्यक्ति की सबसे बड़ी परेशानी अक्सर उसकी जरूरतों से नहीं, बल्कि दूसरों से तुलना करने की आदत से पैदा होती है।
उन्होंने कहा कि जब हम किसी दूसरे का घर, गाड़ी या पहनावा देखकर यह सोचने लगते हैं कि यह सब हमारे पास भी होना चाहिए, तभी अपने जीवन में कमी महसूस होने लगती है। उन्होंने बताया कि उनकी पहली गाड़ी भी सेकंड हैंड थी। जरूरत पड़ी तो गाड़ी ली, लेकिन उसे कभी जीवन का सपना नहीं बनाया।
उनके अनुसार जीवन में हर समय यह तय करना जरूरी नहीं कि आगे क्या-क्या हासिल करना है। कई बार वर्तमान में मिले दायित्व को बेहतर तरीके से निभाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।
‘सीधी राह चलिए, जरूरत पड़े तो मोड़ लीजिए’
डॉ. माखीजा ने जीवन को दो बिंदुओं के बीच की सीधी रेखा से जोड़ते हुए कहा कि सामान्य तौर पर सबसे छोटा रास्ता सीधा होता है, लेकिन जीवन हमेशा गणित की तरह नहीं चलता।
उन्होंने अपने अंदाज में कहा—“In life, go straight and turn right.” यानी दिशा सही होनी चाहिए, लेकिन परिस्थितियां बदलें तो सही समय पर मोड़ लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
उनका मानना है कि लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता अच्छी बात है, लेकिन लक्ष्य को जिद बना लेना व्यक्ति के विकास में बाधा बन सकता है।
जिम्मेदारी मिली तो पीछे नहीं हटे
संगठनात्मक जीवन की चर्चा में डॉ. माखीजा ने कहा कि उन्होंने कभी किसी पद के लिए प्रयास नहीं किया। उनके अनुसार काम करने के लिए पद की जरूरत नहीं होती।
भाजपा में अपने पुराने संगठनात्मक अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि चुनावों और संगठन से जुड़े कार्यों के लिए उन्हें अलग-अलग राज्यों में जिम्मेदारियां मिलीं। छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड, बिहार सहित अन्य क्षेत्रों में भी उन्होंने संगठनात्मक दायित्व निभाए।
बाद में वरिष्ठों के आग्रह और मार्गदर्शन पर विश्व हिंदू परिषद में जिम्मेदारी स्वीकार की। उन्होंने कहा कि उनके लिए सिद्धांत हमेशा एक ही रहा—जहां जिम्मेदारी मिले, वहां पूरी ईमानदारी से काम करो।
लक्ष्य आपका, परिणाम नहीं
डॉ. माखीजा ने लक्ष्य और परिणाम को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि लक्ष्य बनाना जरूरी है, लेकिन परिणाम को पूरी तरह अपने नियंत्रण में मान लेना उचित नहीं।
उन्होंने विद्यार्थी का उदाहरण देते हुए कहा कि विद्यार्थी के हाथ में पढ़ाई और मेहनत है, लेकिन अंतिम परिणाम उसके हाथ में नहीं होता। इसी तरह चिकित्सा क्षेत्र में भी उनका लक्ष्य केवल बड़ा संस्थान खड़ा करना या अधिक कमाई करना नहीं रहा, बल्कि बेहतर नेत्र चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना रहा है।
समाज को जागरूक करने पर जोर
विश्व हिंदू परिषद की भूमिका पर उन्होंने कहा कि सामाजिक कार्य केवल किसी संगठन के कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को जागरूक, संस्कारित, समरस और सेवाभावी बनाने में हर व्यक्ति की भूमिका है।
हिंदुत्व से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा कि समाज को अपने मूल्यों और परंपराओं को समझना चाहिए। उन्होंने इतिहास और सामाजिक परिस्थितियों से सीख लेने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि “किसी से लड़ना नहीं है, लेकिन स्वयं जागृत रहना जरूरी है।”
पत्रकारों को बड़ी सौगात—ओपीडी शुल्क नहीं लगेगा
कार्यक्रम के दौरान डॉ. ललित माखीजा ने बिलासपुर प्रेस क्लब के पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि प्रेस क्लब सदस्यों की ओपीडी फीस निःशुल्क की जाएगी।
उन्होंने बताया कि प्रेस क्लब अध्यक्ष के लेटरपैड अथवा अधिकृत अनुरोध के आधार पर पत्रकारों को यह सुविधा मिलेगी। जरूरत पड़ने पर अध्यक्ष के अनुरोध पर उपचार के मामले में भी हरसंभव सहयोग करने की बात उन्होंने कही।
इस घोषणा का प्रेस क्लब ने स्वागत करते हुए डॉ. माखीजा के प्रति आभार जताया। पत्रकारों के स्वास्थ्य से जुड़ी इस पहल को कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया।
सवालों के बीच खुलता गया जीवन का एक अलग अध्याय
‘हमर पहुना’ में डॉ. माखीजा से पत्रकारों ने उनके निजी जीवन, चिकित्सा सेवा, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और सामाजिक विषयों को लेकर सवाल किए। उन्होंने भी बिना किसी औपचारिकता के अपने अनुभव साझा किए।
कार्यक्रम की सबसे खास बात यह रही कि डॉ. माखीजा ने अपनी उपलब्धियों की गिनती करने के बजाय जीवन जीने की अपनी सोच और अनुभवों को केंद्र में रखा। उनका संदेश स्पष्ट था—मंजिल तय करें, मेहनत करें, लेकिन परिस्थितियों को समझने और सही समय पर रास्ता बदलने की क्षमता भी बनाए रखें। यही शायद जीवन की सबसे बड़ी समझदारी है।
Hamar pradesh CG
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