Monday, October 26 2026
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लिव-इन में रहने वाली महिलाओं के हक में हाईकोर्ट का अहम फैसला सिर्फ शादी वैध नहीं होने की दलील से भरण-पोषण के अधिकार से नहीं किया जा सकता वंचित

abhishek@hamarpradeshcg
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लिव-इन में रहने वाली महिलाओं के हक में हाईकोर्ट का अहम फैसला     सिर्फ शादी वैध नहीं होने की दलील से भरण-पोषण के अधिकार से नहीं किया जा सकता वंचित

रिपोर्ट अभिषेक कुमार पाण्डेय , स्टेट रिपोर्टर hamarpradeshcg

 

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने वाले पुरुष और महिला के संबंध को केवल वैध विवाह के अभाव में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। परिस्थितियां घरेलू संबंध की परिभाषा में आती हैं तो महिला को कानून के तहत राहत और भरण-पोषण का अधिकार मिल सकता है।

 

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें महिला को हर महीने 4 हजार रुपये भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पुरुष की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

 

लंबे समय तक साथ रहने के बाद हुआ विवाद

 

मामला ऐसे पुरुष और महिला से जुड़ा है, जो बिना औपचारिक विवाह के लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे। बाद में दोनों के रिश्ते में विवाद उत्पन्न हुआ और वे अलग रहने लगे।

 

इसके बाद महिला ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत बिलासपुर की जेएमएफसी अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर भरण-पोषण की मांग की। सुनवाई के बाद निचली अदालत ने पुरुष को महिला को 4 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया।

 

पुरुष ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

 

निचली अदालत के फैसले के खिलाफ पुरुष ने पहले विशेष न्यायाधीश के समक्ष मामला रखा और बाद में हाईकोर्ट पहुंचा। उसकी ओर से तर्क दिया गया कि महिला उसकी कानूनी रूप से वैध पत्नी नहीं है। दोनों अब साथ भी नहीं रह रहे हैं, इसलिए उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

 

कोर्ट ने क्या कहा?

 

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि किसी संबंध को केवल विवाह की वैधता के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। यदि पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार ऐसा रिश्ता घरेलू संबंध के दायरे में आ सकता है।

 

ऐसी स्थिति में महिला को घरेलू हिंसा कानून के तहत उपलब्ध कानूनी संरक्षण और राहत से केवल यह कहकर वंचित नहीं किया जा सकता कि दोनों के बीच वैध विवाह नहीं हुआ था।

 

4 हजार रुपये प्रतिमाह का आदेश बरकरार

 

हाईकोर्ट ने जेएमएफसी अदालत द्वारा निर्धारित 4 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि को बरकरार रखा। साथ ही पुरुष की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।

 

क्या है फैसले का महत्व?

 

हाईकोर्ट का यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक साथ रहने वाली महिलाओं के कानूनी अधिकारों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। फैसले से यह स्पष्ट होता है कि किसी महिला को केवल विवाह प्रमाणित न होने के आधार पर घरेलू हिंसा कानून के तहत मिलने वाली राहत से स्वतः बाहर नहीं किया जा सकता।

 

हालांकि, ऐसे मामलों में अदालत संबंध की अवधि, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखकर ही तय करती है कि वह संबंध कानून के तहत घरेलू संबंध की श्रेणी में आता है या नहीं।

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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