Tuesday, October 27 2026
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सिस्टम की संवेदनहीनता पर CM हेल्पलाइन का 'हंटर': मां के इलाज के लिए अस्पताल में भटकता रहा बेटा, फिर एक कॉल ने उड़ाए अफसरों के होश!

State Head - State_head_abhishek
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सिस्टम की संवेदनहीनता पर CM हेल्पलाइन का 'हंटर': मां के इलाज के लिए अस्पताल में भटकता रहा बेटा, फिर एक कॉल ने उड़ाए अफसरों के होश!

सिस्टम की संवेदनहीनता पर CM हेल्पलाइन का 'हंटर': मां के इलाज के लिए अस्पताल में भटकता रहा बेटा, फिर एक कॉल ने उड़ाए अफसरों के होश!

 

 

रायपुर/बिलासपुर:

 

सरकारी अस्पतालों की दहलीज पर जब एक बेबस बेटा अपनी बीमार मां के इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाए, तो स्वास्थ्य तंत्र के दावों की कलई खुल जाती है। लेकिन इस बार सिस्टम की लापरवाही पर प्रशासन का ऐसा चाबुक चला कि चंद मिनटों में सारा अमला अलर्ट मोड पर आ गया।

अस्पताल में मां के इलाज को लेकर परेशान तीमारदार ने जब सीधे मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (CM Helpline) पर गुहार लगाई, तो रायपुर से लेकर स्थानीय अस्पताल तक हड़कंप मच गया। जो स्वास्थ्यकर्मी कुछ देर पहले तक नजरअंदाज कर रहे थे, वे ही आनन-फानन में मरीज की तीमारदारी में जुट गए।

खबर के मुख्य बिंदु (Key Highlights):

 * अस्पताल में बेबसी: मां के गंभीर इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे तीमारदार को व्यवस्था और कर्मचारियों की अनदेखी का सामना करना पड़ा।

 * हेल्पलाइन बना सहारा: घंटों की जद्दोजहद और बेरुखी के बाद पीड़ित बेटे ने सीधे मुख्यमंत्री जनशिकायत हेल्पलाइन पर कॉल कर दिया।

 * मिनटों में एक्शन: रायपुर से सीधा मैसेज फ्लैश होते ही अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूले, दौड़ते-भागते वार्ड पहुंचे डॉक्टर और ड्यूटी स्टाफ।

 * संवेदनशीलता की मिसाल: शिकायत दर्ज होते ही मरीज को तत्काल अटेंड कर बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई।

जब कतारों और सिफारिशों से थककर मिला हेल्पलाइन का संबल

अस्पताल में आमतौर पर आम आदमी का सामना अव्यवस्था, डॉक्टरों की गैरमौजूदगी या कर्मचारियों की टरकाने वाली आदत से होता है। अपनी बीमार मां की बिगड़ती हालत देख बेटा काफी देर तक स्वास्थ्यकर्मियों से गुहार लगाता रहा, लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उसने सरकार के उस भरोसेमंद हथियार का इस्तेमाल किया, जिसे अक्सर अनदेखा समझा जाता है।

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के नंबर पर रिंग होते ही पूरा मामला दर्ज हुआ। हेल्पलाइन ऑपरेटरों ने मामले को 'अति-संवेदनशील और आपातकालीन' श्रेणी में डालते हुए सीधे उच्चाधिकारियों और संबंधित जिला स्वास्थ्य अमले को अलर्ट भेज दिया।

उड़े अफसरों के होश, दौड़ पड़े डॉक्टर

जैसे ही राजधानी के कंट्रोल रूम से संबंधित अस्पताल प्रबंधन के पास कॉल और मैसेज पहुंचे, पूरा प्रशासनिक ढांचा हिल गया। जो स्टाफ कुछ देर पहले तक मरीज की ओर देखने को तैयार नहीं था, वह खुद मरीज की चारपाई तक दौड़ता हुआ पहुंचा। आनन-फानन में सीनियर डॉक्टरों की निगरानी में मां का इलाज शुरू हुआ, आवश्यक दवाएं और जांच तुरंत सुनिश्चित की गईं।

सवाल बड़ा: क्या हर मरीज को मुख्यमंत्री से ही लगानी पड़ेगी गुहार?

इस त्वरित समाधान ने एक तरफ जहां सीएम हेल्पलाइन और सरकार की मॉनिटरिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर मुहर लगाई है, वहीं सरकारी अस्पतालों की कार्यशैली पर एक तीखा सवाल भी खड़ा कर दिया है।

सवाल यह है कि आखिर आम आदमी को उसका बुनियादी हक यानी समय पर इलाज पाने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय तक दस्तक क्यों देनी पड़ती है? क्या निचले स्तर पर तैनात स्वास्थ्यकर्मी और जिम्मेदार अफसर अपनी ड्यूटी केवल किसी बड़े डंडे के डर से ही पूरी करेंगे?

फिलहाल, बेटे ने तत्परता से मिले इलाज के लिए प्रशासन और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का आभार जताया है, लेकिन यह मामला उन लापरवाह कर्मियों के लिए एक सख्त चेतावनी बनकर सामने आया है जो सरकारी अस्पतालों में गरीब और असहाय मरीजों को नजरअंदाज करने की भूल करते हैं।

 

 

अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़ 

हमर प्रदेश सी जी

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in Business.

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