Tuesday, October 27 2026
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हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में 'हितों के टकराव' पर छिड़ी बहस: सरकारी पद संभाल रहे बार पदाधिकारियों से इस्तीफे की मांग, अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला ने उठाए सवाल

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हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में 'हितों के टकराव' पर छिड़ी बहस: सरकारी पद संभाल रहे बार पदाधिकारियों से इस्तीफे की मांग, अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला ने उठाए सवाल

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में 'हितों के टकराव' पर छिड़ी बहस: सरकारी पद संभाल रहे बार पदाधिकारियों से इस्तीफे की मांग, अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला ने उठाए सवाल

 

 

 * "एक ही व्यक्ति दोनों जगह न्याय नहीं कर सकता: या तो सरकार चुनें या बार का पद"

 * बार की स्वायत्तता और वकीलों के स्वतंत्र हितों की रक्षा के लिए अधिवक्ता ने की दो में से एक पद छोड़ने की अपील

 

 

बिलासपुर (विधि संवाददाता)।

 

 

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के भीतर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) का मुद्दा गरमा गया है। उच्च न्यायालय के अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला ने बार एसोसिएशन के उन पदाधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं, जो एक साथ दोहरी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं—एक तरफ बार एसोसिएशन के निर्वाचित प्रमुख पद और दूसरी तरफ महाधिवक्ता कार्यालय (एजी ऑफिस) में शासकीय अधिवक्ता का दायित्व।

अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला ने एक खुली अपील जारी करते हुए ऐसे सभी सम्मानित पदाधिकारियों से नैतिक आधार पर दो में से किसी एक पद को स्वेच्छा से छोड़ने का आग्रह किया है।

"दो नावों की सवारी से बार की स्वतंत्रता पर असर"

अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला का कहना है कि बार एसोसिएशन और सरकार (महाधिवक्ता कार्यालय) की भूमिकाएं पूरी तरह अलग और कई मामलों में एक-दूसरे के आमने-सामने होती हैं।

उन्होंने अपने बयान में कहा:

> "एक ही व्यक्ति दोनों पदों पर रहकर स्वतंत्र रूप से न्याय नहीं कर सकता। यदि कोई पदाधिकारी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहा है, तो वह आम अधिवक्ताओं के हक और बार के हितों के लिए सरकार के खिलाफ खुलकर और स्वतंत्र रूप से संघर्ष नहीं कर पाएगा। वहीं दूसरी ओर, बार के दबाव में वह सरकार के प्रति अपने विधिक दायित्वों के साथ भी पूर्ण न्याय नहीं कर सकेगा।"

> 

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं, बल्कि अधिवक्ताओं के व्यापक हित और बार एसोसिएशन की लोकतांत्रिक व निष्पक्ष छवि को बनाए रखने का सवाल है। उन्होंने पदाधिकारियों पर फैसला छोड़ते हुए कहा कि वे स्वयं तय करें कि उनके लिए कौन सा दायित्व अधिक उपयुक्त है—बार एसोसिएशन का पद या सरकारी वकील की जिम्मेदारी।

 

 

विशेष आलेख

 

बार की स्वायत्तता बनाम सत्ता का प्रभाव: 'हितों के टकराव' से कब मुक्त होंगी विधिक संस्थाएं?

न्यायपालिका के सशक्त और निष्पक्ष संचालन में 'बार' और 'बेंच' को एक ही रथ के दो पहिए माना गया है। इनमें 'बार' यानी अधिवक्ताओं की संस्था केवल वकीलों का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि वह सत्ता की मनमानी के खिलाफ नागरिकों के अधिकारों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पहली रक्षा पंक्ति होती है। ऐसे में जब बार एसोसिएशन के शीर्ष पदाधिकारी ही सरकार के विधिक पैनल या महाधिवक्ता कार्यालय के अंग बन जाते हैं, तब स्वाभाविक रूप से संस्थागत स्वतंत्रता पर गंभीर नैतिक और व्यावहारिक सवाल उठते हैं।

अन्य उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट का अनुभव

देश की विभिन्न अदालतों में यह बहस नई नहीं है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) से लेकर दिल्ली, बॉम्बे, मद्रास और इलाहाबाद जैसे ऐतिहासिक उच्च न्यायालयों में बार की स्वतंत्रता को लेकर हमेशा से सख्त मापदंड रहे हैं:

 * स्वतंत्र निगरानी की परंपरा: ऐतिहासिक रूप से बार एसोसिएशनों ने सरकार की नीतियों, अदालती बुनियादी ढांचे की कमी और वकीलों के कल्याणकारी मुद्दों पर सीधे शासन से सवाल पूछे हैं। यदि बार का नेतृत्व ही शासन के अधीन मानदेय या पद पर होगा, तो वह सरकार के खिलाफ मुखर आंदोलन या न्यायिक समीक्षा की मांग कैसे कर पाएगा?

 * पारदर्शिता और विशेषाधिकार: कई बार यह आरोप लगते हैं कि बार के शीर्ष पदों पर बैठे वकीलों को सरकारी पैनलों में प्राथमिकता मिलती है, जिससे सामान्य और युवा अधिवक्ताओं के अवसर सीमित होते हैं।

 * 'एक व्यक्ति, एक पद' की नैतिक अनिवार्यता: देश के कई प्रमुख बार संघों में अलिखित परंपरा और कुछ स्थानों पर नियम भी रहे हैं कि महत्वपूर्ण सरकारी विधि अधिकारी (जैसे एएसजी, अतिरिक्त महाधिवक्ता या शासकीय अधिवक्ता) बनने के बाद व्यक्ति बार के कार्यकारी पदों से दूरी बना लेता है ताकि हितों का टकराव न दिखे।

दबाव मुक्त बार ही मजबूत लोकतंत्र की पहचान

बार एसोसिएशन का काम केवल चुनाव लड़ना या आयोजनों तक सीमित नहीं है; इसका मूल उद्देश्य आम वकीलों की सुरक्षा, स्वतंत्रता और कानूनी व्यवस्था में संतुलन बनाए रखना है।

अधिवक्ता जितेंद्र शुक्ला द्वारा उठाया गया सवाल विधिक शुचिता और पेशेवर नैतिकता के उस बुनियादी सिद्धांत को छूता है, जिसे 'Conflict of Interest' कहा जाता है। न्याय के सिद्धांत का यह मूल मंत्र है कि “न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।”

यदि बार एसोसिएशनों को अपनी साख, निष्पक्षता और तेवर को अक्षुण्ण रखना है, तो पदाधिकारियों को यह तय करना ही होगा कि उनकी पहली निष्ठा आम अधिवक्ताओं के हितों के प्रति है या फिर सरकार के विधिक तंत्र के प्रति।

 

 

अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़

 

हमर प्रदेश सी जी

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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